चारों तरफ गरम हवा है
शांती तो प्रिय नहीं
युद्घ को मन मचलता है
सत्य ,त्रेता ,द्वापर गए
कलि का युग है
सरल कुछ भी भए ना
शिशु ,बालक ,युवा के साथ
बुढा भी नादाँ है
सरल कुछ भी भए ना
शिशु ,बालक ,युवा के साथ
बुढा भी नादाँ है
जो मिला जीवन में वो भाता नहीं
व्यर्थ की बातों के लिए परेशान है
व्यर्थ की बातों के लिए परेशान है

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